भारत में मदरसा शिक्षा को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ने के लिए सरकारी प्रयास
भारत की शिक्षा प्रणाली एक विविधतापूर्ण परिदृश्य है, जो इतिहास, संस्कृति और आस्था से निर्मित हुई है। इसकी अनेक धाराओं में मदरसा शिक्षा प्रणाली का एक विशेष स्थान है, विशेषकर मुस्लिम समुदाय के कुछ वर्गों के लिए। पारंपरिक रूप से कुरआन, हदीस और इस्लामी न्यायशास्त्र जैसे धार्मिक विषयों पर केंद्रित मदरसों ने सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान को संरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। किंतु विज्ञान, तकनीक और वैश्विक प्रतिस्पर्धा से संचालित तेजी से बदलती दुनिया में पारंपरिक शिक्षा के साथ आधुनिक शिक्षा का समन्वय अत्यंत आवश्यक हो गया है।
इस आवश्यकता को समझते हुए भारत सरकार तथा विभिन्न राज्य सरकारों ने वर्षों से मदरसा शिक्षा के आधुनिकीकरण को अनेक योजनाएं लागू की हैं। इन पहलों का उद्देश्य धार्मिक शिक्षा को समाप्त करना नहीं, बल्कि उसे विज्ञान, गणित, भाषाओं और कंप्यूटर
शिक्षा जैसे आधुनिक विषयों से समृद्ध करना है, ताकि विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा और रोजगार के नए अवसर खुल सकें।
इस दिशा में प्रारंभिक संगठित प्रयास 1993 में शुरू किए गए मदरसा आधुनिकीकरण कार्यक्रम के रूप में सामने आया। इसका मुख्य उद्देश्य मदरसों के पाठ्यक्रम में गणित और विज्ञान जैसे आधुनिक विषयों को शामिल करना था। इन विषयों के अध्यापन के लिये शिक्षकों की नियुक्ति की गई तथा उन्हें मानदेय प्रदान किया गया। यह नीति-निर्माण में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन था, जिसने स्वीकार किया कि केवल धार्मिक शिक्षा वर्तमान सामाजिक-आर्थिक प्रतिस्पर्धा में विद्यार्थियों के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती।
इस दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर 2009-10 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा प्रारंभ की गई ‘मदरसों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने की योजना’ (एसपीक्यूईएम) थी। यह योजना भारत में मदरसा आधुनिकीकरण की सबसे महत्वपूर्ण आधारशिलाओं में से एक बनी। इसके अंतर्गत उन मदरसों को वित्तीय सहायता दी गई जो आधुनिक विषयों को अपनाने के लिए तैयार हुए। योग्य शिक्षकों की नियुक्ति, शिक्षण-सामग्री, विज्ञान किट और कंप्यूटर प्रयोगशालाओं के लिये अनुदान प्रदान किया गया। इसका मूल उद्देश्य यह था कि विद्यार्थी धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ औपचारिक विद्यालयी शिक्षा (कक्षा 1 से 12 तक) के समकक्ष शैक्षणिक दक्षता प्राप्त कर सकें। अनेक परिवारों के लिए इसका अर्थ था कि अब उनके बच्चों को आस्था और भविष्य में से किसी एक को चुनने की मजबूरी नहीं रही।
इसी के समानांतर 2008-09 में ‘अल्पसंख्यक संस्थानों में आधारभूत संरचना विकास योजना’ (आईडीएमआई) प्रारंभ की गई। जहाँ एसपीक्यूईएम पाठ्यक्रम और शिक्षण पर केंद्रित थी, वहीं आईडीएमआइ ने संस्थानों की भौतिक परिस्थितियों को सुधारने का कार्य किया। इसके अंतर्गत कक्षाओं, प्रयोगशालाओं और पुस्तकालयों के निर्माण के लिये धनराशि उपलब्ध कराई गई। स्वच्छ पेयजल, शौचालय और बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं में सुधार किया गया। आधुनिक आधारभूत संरचना ने बेहतर शिक्षण वातावरण प्रदान किया। एसपीक्यूईएम और आईडीएमआई मिलकर व्यापक योजना ‘मदरसों/अल्पसंख्यकों को शिक्षा प्रदान करने की योजना’ (एसपीईएमएम) का हिस्सा बने, जिसका उद्देश्य अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों का समग्र विकास था, मगर 2016 के बाद से लगातार इन योजनाओं के बजट में कटौती होने लगी, जिस कारण एसपीक्यूईएम के तहत आधुनिक विषयों को पढ़ाने वाले हजारों शिक्षकों के सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया, उत्तराखण्ड के ही करीब 15 करोड़ रूपये केंद्र सरकार पर बकाया चल रहे हैं। वहीं, राज्य सरकार ने भी अपने हिस्से का अंशदान नही अदा किया।
वहीं, 2015 में उत्तराखंड सरकार ने अपना मदरसा आधुनिकीकरण कार्यक्रम शुरू किया, जिसमें आधारभूत सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिया गया। इसके अंतर्गत फर्नीचर, कंप्यूटर और पुस्तकालय उपलब्ध कराना, कक्षाओं एवं स्वच्छता सुविधाओं का निर्माण तथा स्वच्छ पेयजल और बिजली की व्यवस्था शामिल थी।
महाराष्ट्र सरकार ने अक्टूबर 2013 में डॉ. जाकिर हुसैन मदरसा आधुनिकीकरण योजना लागू की, जिसके अंतर्गत विज्ञान, गणित, अंग्रेज़ी और क्षेत्रीय भाषाओं को धार्मिक शिक्षा के साथ पढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया गया। इसमें छात्रवृत्तियों तथा गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए निगरानी तंत्र भी शामिल था।
उत्तर प्रदेश, जहाँ देश के सबसे बड़े मदरसा नेटवर्कों में से एक स्थित है, ने भी मदरसा शिक्षा को मुख्यधारा की शिक्षा व्यवस्था से जोड़ने के लिए कई कदम उठाए हैं। हाल के वर्षों में पाठ्यक्रम को मानकीकृत करने और विद्यार्थियों की रोजगार क्षमता बढ़ाने के प्रयास किए गए हैं। आधुनिकीकरण योजनाओं के अंतर्गत नियुक्त शिक्षकों को आधुनिक विषय पढ़ाने हेतु मानदेय दिया गया, जो सरकार की समावेशी दृष्टि को दर्शाता है।
एक महत्वपूर्ण हालिया विकास ‘उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा विधेयक (2025)’ है, जिसका उद्देश्य मदरसों को सीधे राज्य की औपचारिक शिक्षा प्रणाली से जोड़ना है। इस सुधार के अंतर्गत मदरसों को राज्य शिक्षा बोर्ड से संबद्ध किया जाएगा, पाठ्यक्रम को राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप बनाया जाएगा तथा विद्यार्थियों को मानकीकृत शिक्षा और व्यापक अवसर प्राप्त होंगे। यह समानांतर शिक्षा प्रणाली से एकीकृत शैक्षिक ढाँचे की ओर महत्वपूर्ण कदम है।
हालांकि नीतियां और योजनाएं महत्वपूर्ण हैं, उनकी वास्तविक सफलता इस बात में निहित है कि वे लोगों के जीवन को किस प्रकार प्रभावित करती हैं।
फिर भी कुछ चुनौतियां आज भी मौजूद हैं। अनियमित वित्तपोषण, मानदेय में देरी, विभिन्न राज्यों में योजनाओं के असमान क्रियान्वयन, पारंपरिक पहचान खोने की आशंका के कारण कुछ संस्थानों का विरोध, तथा ग्रामीण क्षेत्रों में आधुनिक विषयों के प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी जैसी समस्याएं सामने हैं। ये चुनौतियां निरंतर नीति-समर्थन, बेहतर निगरानी और सामुदायिक संवाद की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं।
भारत की यह यात्रा, जिसमें पारंपरिक मदरसा शिक्षा और आधुनिक वैज्ञानिक ज्ञान के बीच की दूरी को पाटने का प्रयास किया जा रहा है, विरासत और प्रगति के बीच एक संतुलित दृष्टिकोण को दर्शाती है।
इंशा वारसी
फ़्रैंकोफोन एवं पत्रकारिता अध्ययन
परंपरा और आधुनिकता के बीच सेतु की भूमिका निभा रहे मदरसे

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