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सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका: भगवान श्रीराम के जीवित वंशजों को मान्यता देने की मांग

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका (PIL) ने सांस्कृतिक निरंतरता, संवैधानिक समानता और आधुनिक भारत में जीवित विरासत की भूमिका को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक बहस छेड़ दी है। यह याचिका बाबा परमहंस चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा दायर की गई है, जिसमें अयोध्या के राजा भगवान श्रीराम के पुत्र लव के वंशज के रूप में अजय हरिनाथ सिंह को उनका एकमात्र जीवित वंशज मान्यता देने की मांग की गई है। अजय हरिनाथ सिंह डार्विन प्लेटफॉर्म ग्रुप ऑफ कंपनीज़ के चेयरमैन भी हैं, जो लगभग 68,000 करोड़ रुपये की नेटवर्थ वाला एक भारतीय वैश्विक व्यापार समूह है।
याचिका में तर्क दिया गया है कि जहां भारत ने भगवान राम से जुड़े भौतिक स्मारकों और स्थलों के संरक्षण पर पर्याप्त संस्थागत ध्यान दिया है, वहीं रामायण से जुड़ी जीवित वंश परंपरा को अब तक आधिकारिक मान्यता और औपचारिक सहभागिता से वंचित रखा गया है।
याचिका के अनुसार, अजय हरिनाथ सिंह को भगवान श्रीराम के पुत्र लव की परंपरा के माध्यम से 910वीं पीढ़ी का वंशज बताया गया है। इस दावे को वंशावली अभिलेखों तथा संस्कृत और रामायण के प्रख्यात विद्वान एवं सिंह के कुलगुरु जगद्गुरु रामभद्राचार्य द्वारा प्रदत्त आध्यात्मिक प्रमाणन का समर्थन प्राप्त है।
याचिका में किसी प्रकार के भौतिक लाभ या राजनीतिक पद की मांग नहीं की गई है, बल्कि केवल वंश की औपचारिक मान्यता और भगवान श्रीराम से जुड़े महत्वपूर्ण राष्ट्रीय एवं धार्मिक आयोजनों में सम्मिलित किए जाने का अनुरोध किया गया है।
PIL में संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का हवाला देते हुए कहा गया है कि वंश के आधार पर मान्यता से इनकार करना वंशानुगत भेदभाव है और यह गरिमा के अधिकार का उल्लंघन करता है। इसके साथ ही अनुच्छेद 49 और 51A(फ) का उल्लेख किया गया है, जो राज्य और नागरिकों पर भारत की समग्र संस्कृति और विरासत के संरक्षण का दायित्व डालते हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि जनवरी 2024 में आयोजित राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा जैसे ऐतिहासिक आयोजनों से भगवान राम के वंशजों को बाहर रखना चयनात्मक विरासत मान्यता पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
याचिका में यूनेस्को के उन अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों का भी उल्लेख किया गया है, जो “जीवित विरासत” और सांस्कृतिक वाहकों को संरक्षण प्रयासों का अभिन्न अंग मानते हैं। याचिका का तर्क है कि जहां स्मारकों और पांडुलिपियों को वैधानिक संरक्षण प्राप्त है, वहीं जीवित सांस्कृतिक संरक्षकों की उपेक्षा की जा रही है।
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि वह इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और वंशावली विशेषज्ञों को शामिल करते हुए एक स्वतंत्र आयोग के गठन पर विचार करे, जो पारदर्शी और विशेषज्ञ-आधारित तरीके से वंश अभिलेखों की जांच कर सके। उनका कहना है कि राजनीतिकरण से बचने और अकादमिक कठोरता सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक निगरानी आवश्यक है।
यह मामला अदालत से बाहर भी व्यापक चर्चा का विषय बन गया है और इसने यह सवाल उठाया है कि भारत किस प्रकार आस्था, इतिहास और संवैधानिक शासन के बीच संतुलन बनाता है। पर्यवेक्षकों का कहना है कि देश में विभिन्न राजघरानों को सांस्कृतिक संरक्षक के रूप में ऐतिहासिक मान्यता मिलती रही है, जबकि भारत के सबसे पूज्य पात्रों में से एक से जुड़े वंश को अब तक औपचारिक पहचान नहीं मिली है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह मामला भारतीय कानून में अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के साथ व्यवहार को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल स्थापित कर सकता है। मामला वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचाराधीन है, जहां यह देखा जाएगा कि यह विषय जनहित याचिका और सांस्कृतिक अधिकारों की न्यायशास्त्र के दायरे में आता है या नहीं। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, दांव पर केवल किसी एक व्यक्ति की मान्यता नहीं है, बल्कि यह प्रश्न है कि क्या भारत की सभ्यतागत कथा में स्मारकों और शास्त्रों के साथ-साथ उनके जीवित उत्तराधिकारियों को भी स्थान मिलेगा।

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